Saturday, July 23, 2016


सभ्यता  सिंधु  घाटी की 


दशकों से ढूँढ रहे
तथ्य अब भी अधूरे
तथ्य अब भी प्यासे ।
उदय को समय सीमा में बाँध नहीं पाते
अस्त का कारण  हम  ढूँढ    नहीं  पाते ।

रोचक हैं , रोमांचित करती विश्व को    
सभ्यता  ये  सिंधु    घाटी            की   ।

मिले    हैं     अब         तक   अवशेष          अनगिनत
हर     अवशेष        कहती    एक   नई    कहानी    हैं ।

मिला नहीं लेकिन कोई राजा , न मिलती कोई रानी हैं
न   ही   मिला  कोई अब तक युद्ध के नामो निशान हैं
हां मिले लेकिन हैं , दूर   देशों से व्यापर के प्रमाण  हैं  ।


रोचक हैं , रोमांचित करती विश्व को    
सभ्यता  ये  सिंधु    घाटी            की   ।

घर थे उनके नियमों मैं बंधे, हर घर थे पके  ईंटों से बने
धूप   छावं  पानी        हवा , बंटते थे सब बिन भेद भाव ।

मिले हैं अब तक  सील कई , हर सील पे उकरे संकेत कई
गज , मीन ,हल आदी वाले ये संकेत भाषा हैं या आभाषा
हज़ारों शोध और लेखो में  सवाल  बन   उलझी   परी     हैं  ।


रोचक हैं , रोमांचित करती विश्व को    
सभ्यता  ये  सिंधु    घाटी            की   ।

-- अमर 






Saturday, June 11, 2016


ज़ीस्त इकरारनामे का बयां करना आसान नहीं

 दिल और  दिमाग कि   जंग ताउम्र याद रहेगी । 

                                                   - अमर 

***
ज़िल्द निकाल  फेंकी  ज़िंदगी से अब अपने 

पुराने होने की हकीक़त पे यकीन हो चला  । 

                                                     - अमर 


                                                 


Sunday, April 17, 2016

ख्यालो के उर्श पे
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ख्यालो के उर्श पे कई बार जवां हुए
मगर हक़ीक़त ख़्वाब से कोसो दूर ही रहे ।
इज़हार की हर कोशिश -
             दोस्तों के ठहाके में खो गयी
बरसों हो चले अब -
       याद मगर उसकी दिल से न गयी ।
हर जानी पहचानी आहट पे
नज़र ढूँढने लगती हैं उसके निशान ।
बहुत कुछ पाया इन बरसों में
दिल में  अब  भी  वीरानी  हैं ।
सकूँन के हर पल गुज़रते हैं बस उसकी याद में ।






Sunday, January 10, 2016



बहुत ही  मुश्किल हैं ज़िंदगी के ज़िद्दों को संभालना 
अक्सर  अपनी  ही  नज़रों  में   गिर  जाते  हैं   हम । 
                                                                 -अमर 

Sunday, November 1, 2015

कुछ क़त्ल हुऐ
अफवाहों का बाजार गरम हुआ
क़ातिल न मिला
एक सोच बन बैठी कसूरवार ।

ज़ख़्मी  दिल थे कई
मौके की  तलाश में
चर्चो का बाजार गरम हो चला
चले थे जो मिलों लाशो की ढेर पे
जगे ज़मीर का वास्ता दे
लौटा रहे हैं अपना इनाम ।

सुना था" कुछ बात हैं की मिटती नहीं हस्ती हमारी"
क्या महज चंद घटनाएँ हिला देंगी बुनयाद हमारी ?
आईने में देखा खुद को ,बाहर की आवो हवा का जायजा लिया
सब कल सा ही था ,सिवाए कुछ चीखते बंद सोच वाले जमात के -
जो जोर जोर से कह रहे "उनकी बोलने की आज़ादी छीन गयी" ।

हज़ारों तूफान भी नहीं तोड़ पायी
जहाँ  की  विविध्ताओं   को
मत बांध्ये  वहा की सोच को परिधि  में
न आपकी न उनकी
ज़िंदा रहने दीजिये सबकी अपनी अपनी सोच ।
              -अमर 

Sunday, September 27, 2015


वे  जंग  भी  बहुत    ख़ूबसूरत    होते   हैं 
दुश्मनों के दिल में जब ईमान बरसते हो  । 

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खर्च दिए       ख्याल सारे
      दुसरो की ज़िंदगी संभालने में 
उधार ढूंढ़ता हु सोच अब  
     अपनी   ज़िंदगी    संवारने को  । 

***

ज़िंदगी का सफर भी खूब रहा 
जिस किनारे को मंज़िल समझ उतरा 
मालूम हुआ मेरी ज़िंदगी यही से शुरू हुई थी । 



Saturday, August 15, 2015



बरसों  की   ख़ामोशी  का  अंत   भी  खूब   रहा 
खयालों  के अनगिनत परत  खुलती चली गयी  ।

*
तलब   हैं ऐ  ज़िंदगी  तुमसे  बात  करने की
खुद के हालात बयां कर दिल को सकूँ आये ।

*
किया खूब बयां किया तुमने अपने एहसासों को
कुछ  शब्द  चुरा   मेरी  नज़म भी जवा हो उठी ।

- अमर