Sunday, April 17, 2016

ख्यालो के उर्श पे
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ख्यालो के उर्श पे कई बार जवां हुए
मगर हक़ीक़त ख़्वाब से कोसो दूर ही रहे ।
इज़हार की हर कोशिश -
             दोस्तों के ठहाके में खो गयी
बरसों हो चले अब -
       याद मगर उसकी दिल से न गयी ।
हर जानी पहचानी आहट पे
नज़र ढूँढने लगती हैं उसके निशान ।
बहुत कुछ पाया इन बरसों में
दिल में  अब  भी  वीरानी  हैं ।
सकूँन के हर पल गुज़रते हैं बस उसकी याद में ।






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