Wednesday, October 29, 2008

एक पल

एक पल गुजार लो संग मेरे कि
जीने के हजारों बहाने ढूँढ लूँगा
पास न भी हो तो किया
तेरे संग होने का ऐहसास बना लूँगा


Saturday, October 18, 2008

हे प्रियतम !

हे प्रियतम ! बार बार समुद्र लेहरों कि तरह पास आ दूर क्यों चले जाते हो !

हर बार नई आशाओं का दीप जला के , फिर क्यों उन्हें बुझा जाते हो !