Sunday, April 17, 2016

ख्यालो के उर्श पे
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ख्यालो के उर्श पे कई बार जवां हुए
मगर हक़ीक़त ख़्वाब से कोसो दूर ही रहे ।
इज़हार की हर कोशिश -
             दोस्तों के ठहाके में खो गयी
बरसों हो चले अब -
       याद मगर उसकी दिल से न गयी ।
हर जानी पहचानी आहट पे
नज़र ढूँढने लगती हैं उसके निशान ।
बहुत कुछ पाया इन बरसों में
दिल में  अब  भी  वीरानी  हैं ।
सकूँन के हर पल गुज़रते हैं बस उसकी याद में ।






Sunday, January 10, 2016



बहुत ही  मुश्किल हैं ज़िंदगी के ज़िद्दों को संभालना 
अक्सर  अपनी  ही  नज़रों  में   गिर  जाते  हैं   हम । 
                                                                 -अमर 

Sunday, November 1, 2015

कुछ क़त्ल हुऐ
अफवाहों का बाजार गरम हुआ
क़ातिल न मिला
एक सोच बन बैठी कसूरवार ।

ज़ख़्मी  दिल थे कई
मौके की  तलाश में
चर्चो का बाजार गरम हो चला
चले थे जो मिलों लाशो की ढेर पे
जगे ज़मीर का वास्ता दे
लौटा रहे हैं अपना इनाम ।

सुना था" कुछ बात हैं की मिटती नहीं हस्ती हमारी"
क्या महज चंद घटनाएँ हिला देंगी बुनयाद हमारी ?
आईने में देखा खुद को ,बाहर की आवो हवा का जायजा लिया
सब कल सा ही था ,सिवाए कुछ चीखते बंद सोच वाले जमात के -
जो जोर जोर से कह रहे "उनकी बोलने की आज़ादी छीन गयी" ।

हज़ारों तूफान भी नहीं तोड़ पायी
जहाँ  की  विविध्ताओं   को
मत बांध्ये  वहा की सोच को परिधि  में
न आपकी न उनकी
ज़िंदा रहने दीजिये सबकी अपनी अपनी सोच ।
              -अमर 

Sunday, September 27, 2015


वे  जंग  भी  बहुत    ख़ूबसूरत    होते   हैं 
दुश्मनों के दिल में जब ईमान बरसते हो  । 

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खर्च दिए       ख्याल सारे
      दुसरो की ज़िंदगी संभालने में 
उधार ढूंढ़ता हु सोच अब  
     अपनी   ज़िंदगी    संवारने को  । 

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ज़िंदगी का सफर भी खूब रहा 
जिस किनारे को मंज़िल समझ उतरा 
मालूम हुआ मेरी ज़िंदगी यही से शुरू हुई थी । 



Saturday, August 15, 2015



बरसों  की   ख़ामोशी  का  अंत   भी  खूब   रहा 
खयालों  के अनगिनत परत  खुलती चली गयी  ।

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तलब   हैं ऐ  ज़िंदगी  तुमसे  बात  करने की
खुद के हालात बयां कर दिल को सकूँ आये ।

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किया खूब बयां किया तुमने अपने एहसासों को
कुछ  शब्द  चुरा   मेरी  नज़म भी जवा हो उठी ।

- अमर 

Saturday, July 25, 2015

भीनी भीनी सी खुश्बू आयी हैं तेरे शहर से
बड़ा मुश्किल होता हैं दिल को समझाना
मत बाँधा कर मुझको वादों की  ज़ंजीर से
जी चाहे बन मुशफिर फिर लौट आऊँ तेरे शहर को 

Saturday, May 9, 2015

अजीब ऐ हालात में फंस गयी  हैं ज़िंदगी 
न  आगे  जाती  हैं ,  न  पीछे  मुड़ती  हैं ।