Saturday, August 15, 2015



बरसों  की   ख़ामोशी  का  अंत   भी  खूब   रहा 
खयालों  के अनगिनत परत  खुलती चली गयी  ।

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तलब   हैं ऐ  ज़िंदगी  तुमसे  बात  करने की
खुद के हालात बयां कर दिल को सकूँ आये ।

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किया खूब बयां किया तुमने अपने एहसासों को
कुछ  शब्द  चुरा   मेरी  नज़म भी जवा हो उठी ।

- अमर 

Saturday, July 25, 2015

भीनी भीनी सी खुश्बू आयी हैं तेरे शहर से
बड़ा मुश्किल होता हैं दिल को समझाना
मत बाँधा कर मुझको वादों की  ज़ंजीर से
जी चाहे बन मुशफिर फिर लौट आऊँ तेरे शहर को 

Saturday, May 9, 2015

अजीब ऐ हालात में फंस गयी  हैं ज़िंदगी 
न  आगे  जाती  हैं ,  न  पीछे  मुड़ती  हैं । 

Saturday, April 25, 2015

हज़ारों के   जनाजे में रोना  भी  नहीं   आता   हैं
ख़ुदा से ख़ुदा की शिकायत कर सुकून ढूंढ लेते हैं ।


हर   के   हाथों     में         खंज़र
दिल   में   दुश्मनों  की  कतार हैं । 
मौकापरस्ती का अब ये आलम हैं 
बेगुनाही की एक शाख के ताक में   
हर कोई कत्ले आम को बेताब  हैं । 


Sunday, April 5, 2015

तेरा यकीन

इक   मैं   हु,  इक  तेरा  यकीन   हैं
इंसान एक, दोनो कितने अलग हैं ।

ढलते सूरज को देख , अँधेरे कि सोचता मैं
और तुम करती हो मेरी सुबह का इंतज़ार ।

राहें हजार , देख मेरे कदम डगमगा जाते हैं
और तुम हर राहों पे ढूंढ लेती हो मेरे निशान ।

हर हालात में , थामे रखा हैं तुमने मेरा हाथ
जाने  क्यों करती  हो तुम मुझसे इतना प्यार ।

Saturday, March 28, 2015

?

मत कर बदनाम इतना की  नाम न होने लगे
उनकी जगह  तेरी नीयत  पे शक न होने लगे ।
                                                 - अमर