Saturday, April 25, 2015

हज़ारों के   जनाजे में रोना  भी  नहीं   आता   हैं
ख़ुदा से ख़ुदा की शिकायत कर सुकून ढूंढ लेते हैं ।


हर   के   हाथों     में         खंज़र
दिल   में   दुश्मनों  की  कतार हैं । 
मौकापरस्ती का अब ये आलम हैं 
बेगुनाही की एक शाख के ताक में   
हर कोई कत्ले आम को बेताब  हैं । 


Sunday, April 5, 2015

तेरा यकीन

इक   मैं   हु,  इक  तेरा  यकीन   हैं
इंसान एक, दोनो कितने अलग हैं ।

ढलते सूरज को देख , अँधेरे कि सोचता मैं
और तुम करती हो मेरी सुबह का इंतज़ार ।

राहें हजार , देख मेरे कदम डगमगा जाते हैं
और तुम हर राहों पे ढूंढ लेती हो मेरे निशान ।

हर हालात में , थामे रखा हैं तुमने मेरा हाथ
जाने  क्यों करती  हो तुम मुझसे इतना प्यार ।

Saturday, March 28, 2015

?

मत कर बदनाम इतना की  नाम न होने लगे
उनकी जगह  तेरी नीयत  पे शक न होने लगे ।
                                                 - अमर 

Sunday, March 1, 2015


मिलता नहीं कोई यहाँ अपनी मज़हब का
दे दे ख़ुदा  थोड़ी  सी  जमी  घर बसाने को ।

हज़ारों    निगाहों    का    शिकार    हु    मैं
मेरी लहू में अपनी किस्मत देख बैठे हैं वे ।

जाने   कितने   रंगो  मैं  रंग रखा हैं मुझको
मालूम नहीं मगर उनको मैं तो बस बेरंग हु । 


Sunday, January 11, 2015

खुले आम क़त्ल



जिस  शाख पे बैठ खुले आम क़त्ल करते रहे
हज़ारों  जुबां  उन्हें  ही   बेगुनाह  बताते  रहे   ।
 
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पी लेने दे थोड़ा सा  काम ,थोड़ी सी ज्यादा
हर का हो बस इक  पैमाना ,  ज़रूरी  नहीं   ।


                 


 

Sunday, September 28, 2014


ऐ ज़िंदगी , मुड़ के देख ले एक बार जरा 
बरसों के गीले शिकवे पल में दूर हो जायेंगे !
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फुरसत के ख्याल दिल में भरने लगी हें आहें 
पैबंद लग जा आँखों में , वक़्त थम जा तू जरा !
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झूठी हँसी  होंठो  पे , कुतरे  हुए  शब्द  जुबां     पे 
यकीन मान , शुकून मिला खुद को देख आईने में !
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आज शाम खोल रखा हैं घर के सारे दरवाजे 
बिन दस्तक आ जाना , पलटने हैं पुराने कई पन्ने !
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