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Saturday, July 19, 2008

पिघलते जिस्म के रंग

पिघलते जिस्म के रंग
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पिघलते जिस्म के रंग को देख
डर गया हु मैं !
हर एक के चेहरे अनेक देख
डर गया हु मैं !
किस्से उम्मीद करूँ मैं ,
भरोसे के कतल को देख
डर गया हु मैं !
किसका साथ मंगू मैं ,
एहशानफरामोशी के हद को देख
डर गया हु मैं !
इस शहर कि आवो हवा मैं
अपनी साँसों का मतलब
भूल गया हु मैं !
पिघलते जिस्म के रंग को देख
डर गया हु मैं !
---- कुमार अमरदीप

Tuesday, June 10, 2008

Meri Ek Kavita

हे राम ! मैं अधर्मी पापी

देता हू तुम्हे ललकार

आ सको तो आओ इस धरा पे

फिर एक बार

सत्य कि माला लिए

विजय कि आशा लिए

करने धर्मं का कल्याण

आ सको तो आओ इस धरा पे

फिर एक बार

हे राम !