Saturday, April 13, 2013

ये रात एक गज़ल सी

चाँद छुप  जा बैठा आज , छत पे जो निकले हो तुम
खिल रही हैं तेरी चाँदनी ,  छा रहे हो  तुम
ये रात एक  गज़ल  सी ,   गा रहे हो  तुम ।

हजारों   इश्क   वाले   हो  रहे हैं पैदा आज
बालो की सफेदी क्या , दिल हो रहे हैं  ज़वा आज
मदहोश सब , होश में  लाने कि हर कोशिश  नाकाम |

चाँद छुप  जा बैठा आज , छत पे जो निकले हो तुम
खिल रही हैं तेरी चाँदनी ,  छा रहे हो  तुम
ये रात एक  गज़ल  सी ,   गा रहे हो  तुम ।

कोई हैं रहा हैं तेरी खूबसूरती का कायल 
कोई हो रहा हैं तेरी आवाज में  मशगूल
चर्चा बस तेरी , हर जुबान हैं बेलगाम

चाँद छुप  जा बैठा आज , छत पे जो निकले हो तुम
खिल रही हैं तेरी चाँदनी ,  छा रहे हो  तुम
ये रात एक  गज़ल  सी ,   गा रहे हो  तुम ।

                                    - अमर 



1 comment:

Unknown said...

lovely poem...check out mine at www.thinkndshare.blogspot.com