Friday, December 21, 2012

कुछ बदलने को जी चाहा हैं


न बंदूक न बाजुओं में ताकत
पर लड़ने को जी  चाहा हैं
कुछ बदलने को जी  चाहा हैं ।

मालूम नहीं बचे होंगे उन आँखों में आंसू  अब
दिल रोता हैं लेकिन मेरा
हजारों रूहों कि चीख सुन सुन के ।

ख़ूनी नाख़ून से खरोचे हु वे जिस्म
जिंदा हो के भी मरते जाते हैं -
सिहर उठ रहे  हर सोच मेरी ।

बुझने न देंगे  मसाल अब
लड़ने को जी  चाहा हैं
कुछ बदलने को जी  चाहा हैं ।
               
                          -अमर 
 
 




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